आचार्य रजनीश ने नारी की समानता पर विशेष बल दिया है उनका द्रष्टिकोण केवल आर्थिक, सामाजिक और राजनितिक तक सीमित नहीं है वह उसको काम के धरातल पर भी समानता की बात करते है। वह कहते है कि स्त्री की उत्सुकता किसी पुरुष में और पुरुष की उत्सुकता किसी स्त्री में हो तो इसे वहुत अधिक महत्व दिए जाने की आवश्यकता नहीं हैं। अगर समाज से वैश्यावृति को मिटाना है तो वह इसको आवश्यक मानते की काम-वासना को समझा जाये। इसके लिए वह घोटुल व्यवस्था को आवश्यक मानते है।
वह कहते है की काम को समझे विना हम शोषण मुक्त समाज की स्थापना नहीं कर सकते है, प्रभु की प्राप्ति में काम और प्रेम से होकर गुजरना पड़ता है व्यक्ति काम-वासना से मुक्त नहीं हो पाता इसलिए वह प्रेम भी नहीं कर पता है, विना प्रेम के प्रभु की प्राप्ति नहीं होती, वह कहते है प्रभु परम आनन्द है। वह कहते है कि विवाह कठिन होना चाहिए और तलाक सरल होना चाहिए उनकी अवधारणा में वडा परिवार है जहाँ सभी प्रेम से रहते हैं काम-वासना विभाजन रेखा न हो।
वह कहते है की काम को समझे विना हम शोषण मुक्त समाज की स्थापना नहीं कर सकते है, प्रभु की प्राप्ति में काम और प्रेम से होकर गुजरना पड़ता है व्यक्ति काम-वासना से मुक्त नहीं हो पाता इसलिए वह प्रेम भी नहीं कर पता है, विना प्रेम के प्रभु की प्राप्ति नहीं होती, वह कहते है प्रभु परम आनन्द है। वह कहते है कि विवाह कठिन होना चाहिए और तलाक सरल होना चाहिए उनकी अवधारणा में वडा परिवार है जहाँ सभी प्रेम से रहते हैं काम-वासना विभाजन रेखा न हो।
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