Friday, November 2, 2012

ओशो और काम विकृति

         आचार्य रजनीश के अनुसार समाज से वैश्यावृति और बलात्कार की घटनाएँ तथा समलैंगिकता को समाप्त करना है तो किशोरों के लिए घोटुल व्यवस्था को लागू करना पड़ेगा। परमात्मा की प्राप्ति में काम-वासना को उन्होंने वाधा माना है किन्तु उन्होंने इसके दमन करने की बात नहीं की वल्कि उसको जानने के लिए घोटुल व्यवस्था को लागू करने की बात कही है ताकि उसका रस समाप्त हो जाये और प्रभु भक्ति और ज्ञान ध्यान में वाधा न पड़े। वह कहते है 18 वर्ष की आयु में काम-वासना अपने चरम पर होती है। इसको जानने और समझने का अवसर दिया जाये तो काम विकृति पूरे जीवन के लिए समाप्त हो जाएगी यदि इसको समझने का अवसर न दिया जाये तो कामुकता का मनोरोग पूरे जीवन भर बना रहता है। वह कहते है मनुष्य जैसा पशु  कामुक नहीं रहता है वह सिर्फ विशेष काल में सम्भोग की क्रिया करते है उनमें बलात्कार की घटनाये भी नहीं होती है।
       वह अपनी बात पर बल देते हुए कहते है कि अंग्रेजो द्वारा प्राप्त की गयी रिपोर्टो के अनुसार माध्य प्रदेश  के पारसना जिले में पायी जाने वाली जनजातियों में घोटुल की व्यवस्था पाई गई है यहाँ पर 16 वर्ष के युवाओ को दो वर्ष तक कामन गृहो में रखा जाता है जहाँ वह किसी भी लड़की या लड़के के साथ सोने को स्वतंत्र होते है किन्तु  कोई भी लड़का या लड़की तीन दिन से ज्यादा एक दूसरे के पास नहीं सो सकते इस प्रकार सभी लड़के और लडकियों को एक-दूसरे के साथ सोने का अवसर मिलता है इस प्रकार वह 18 वर्ष की अवस्था प्राप्त करने के पश्चात विवाह करते है किन्तु न ही घोटुल में लडकियों के गर्भवती होने की घटनाये पाई गयी और न ही वहां पर बलात्कार और छेड़-छाड़ की घटनाये पाई गयी है। वह कहते है कि ऐसा स्त्री के इच्छित गर्भ नियमन के कारण हो पाता है। आज वैकल्पिक उपाय हो जाने के बाद वह सम्पूर्ण सुखमय जीवन के सन्दर्भ में इसको तुच्छ मानते है क्योकि यह ज्ञान, ध्यान और प्रभु भक्ति की प्राप्ति के मार्ग में वाधा है। यदि काम-वासना को समझने न दिया गया तो यह जीवन भर का मनोरोग हो जाता है, व्यक्ति का जीवन कामुकता पूर्ण हो जाता है उसे हर वस्तु में काम ही नजर आता है चाहे वह सुंदर स्त्री, वच्ची, पशु या चित्र और कला कृतियाँ ही क्यों न हो।      
 

No comments:

Post a Comment