Monday, November 12, 2012

जितना मैंने आचार्य रजनीश को समझा :-

          वह मनुष्य जाति को आनंदमय देखना चाहते हैं इसलिए उन्होंने उन सभी षड्यंत्र का विरोध किया है जो मनुष्य जाति को आनंदमय वनाने में वाधक है। वह एक ही वात कहते हैं "ध्यान करो" और ध्यान ही आनंद का मूल मार्ग है। ध्यान को वह विचार शून्यता भी कहते हैं। (अन्य स्रोतों से प्राप्त ध्यान की महिमा निम्नवत है:- ध्यान से विश्वशक्ति प्राप्त होती है, विश्वशक्ति शूक्ष्म मात्र में निद्रा की अवस्था में भी व्यक्ति को प्राप्त होती है। यह विश्वशक्ति जाग्रत व्यक्ति ध्यान की अवस्था को प्राप्त कर प्राप्त कर सकता है। विश्वशक्ति से हम अच्छा स्वास्थ, शांति, ज्ञान, शक्ति, सौभाग्य, लोक और परलोक की शक्तियों के साथ आत्मसात कर सकते हैं।  निद्रा के पश्चात हम अधिक उर्जावान होते हैं हम चीजो को अच्छे से सुन और समझ पते हैं। बुद्धजीवी समाज इसका चिंतन कर सकता है कि निद्रा की अवस्था में हम ऐसा क्या ग्रहण कर लेते हैं जिससे हम उर्जावान हो जाते हैं। भोजन करने से तो कुछ पोषक तत्व हमारे शरीर में जाते हैं और हम उर्जावान हो जाते हैं परन्तु कई वार तो हम विना भोजन के भी उर्जावान रहते हैं  अगर नीद पर्याप्त मात्र में ली गयी है,  इसके विपरीत नीद न लेने पर हम भोजन करने के पश्चात भी अपने आप को  उर्जावान महसूस नहीं कर पते हैं।  विश्वशक्ति की अधिक से अधिक मात्र प्राप्त कर हम उपरोक्त महत्वकंक्षाओ की पूर्ति कर सकते हैं। फिर भी स्वास्थ के द्रष्टिकोण से "अपरिहार्य ध्यान" को आयु के अनुपात में आवश्यक वताया गया है।  ध्यान को पांच वर्ष की आयु से आरम्भ किया जाना चाहिए,  पांच वर्ष की आयु के व्यक्ति के लिए पांच मिनट का ध्यान पर्याप्त है, इसी प्रकार 30 वर्ष की आयु के व्यक्ति को 30 मिनट का ध्यान करना चाहिए इससे वह स्वस्थ रहकर अपनी जिम्मेदारियों का अच्छे से अनुपालन कर पायेगा। ध्यान की क्रिया के संवंध में ध्यानयोगियो के विभिन्न मत है कि ध्यान को किस प्रकार किया जाये, व्यक्तियों और पर्यावरण के अनुसार ध्यान की  भांति-भांति की पद्दतियां  है।  इन पर वाद में स्वतंत्र चिंतन किया जायेगा। ....... ) ध्यान में जो भी वाधक तत्व है उनका उन्होंने घोर विरोध किया है वह मानते है परमात्मा की प्राप्ति हर व्यक्ति का मूल अधिकार है परमात्मा ही परम आनन्द है। इसलिए उन्होंने परम्परागत विवाह पद्दति का भी विरोध किया है क्योकि इस पद्दति के कारण व्यक्ति परम आनंद का सुख पाने  से बंचिंत हुआ है। वह आत्मा और परमात्मा की अवधारणा को मानते है वह मानते हैं की एक विश्वशक्ति है जो पूरे ब्रह्माण्ड का सञ्चालन कर रही है और आत्मा को उसी में विलीन हो जाना है इसलिए वह शरीर पर उन सभी राजनितिक और सामाजिक प्रतिबंधो का पुरुजोर विरोध करते हैं जो आनंद में वाधक हैं। परमात्मा की प्राप्ति का मूल मार्ग ध्यान है, ध्यान से उस परम आनंद को प्राप्त किया जा सकता है जो अकथनीय है। उस आनंद का आभाश दिलाने के कुछ उपाए उन्होंने किये हैं फिर भी उन्होंने कहा है। आम का स्वाद किसी दुसरे के स्वाद से तुलना करके नहीं वताया जा सकता क्योकि वह परमात्मा चुक नहीं गया और उसने एक जैसी दो चीजे नहीं वनायी हैं इसी प्रकार उस परम आनंद की तुलना किसी दूसरे नहीं की जा सकती है। जिस प्रकार सभी व्यक्तियों को चिरभोग का अधिकार है उसी प्रकार सभी व्यक्तियों को परमात्मा की प्राप्ति का अधिकार है, जिस प्रकार कुछ नेत्रहीन व्यक्तियों को इस सुन्दर संसार का वोध नहीं कराया जा सकता उसी प्रकार कुछ लोग उस परम आनंद से वंचित हो सकते हैं किन्तु वांकी सभी की आँखों  से मात्र आँख की पट्टी खोलना है।........................जारी है ...........









जो मित्र मुझसे असहमत हैं k.mittra@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं अथवा 09335122064 पर संपर्क करें।  ब्लोग्स में टिपण्णी कर सकते  "अनार्यो की खोज "(http://anaryokikhoj.blogspot.in/2012/11/0-1.html ) "आगे की यात्रा" (http://aagekiyatra.blogspot.in)  आचार्य रजनीश एक नवीन विचारधारा   (http://aacharyrajneesh.blogspot.in/2012/11/blog-post_12.html) हैं।   

No comments:

Post a Comment